– 42 पानी की टंकिया का निर्माण लटका
नागपुर– मनपा के माध्यम से शहर में जगह नहीं दिए जाने के कारण 170 करोड़ रुपये की अमृत योजना अधर में लटक गई है. इस योजना के तहत 42 पानी की टंकियों का निर्माण किया जाना था। उल्लेखनीय है कि मनपा में भाजपा 3 टर्म से सत्ता में हैं.
नागपुर शहर में 24X7 जलापूर्ति योजना पर काम चल रहा है,जिसकी गति अत्यंत धीमी होने के कारण कई बार अतिरिक्त समय और निधि उपलब्ध करवाने के बावजूद आज तक सम्पूर्ण शहर को 24 बाय 7 जलापूर्ति योजना से रु-ब-रु नहीं करवा पाई।
याद रहे कि सभी को समान पानी उपलब्ध कराने और इसे टैंकर मुक्त शहर बनाने के लिए केंद्रीय सरकार की अमृत योजना के तहत 42 पानी की टंकियों का निर्माण किया जाना था। इनमें से एक पानी की टंकी दो मंजिला है। इस कार्य का भूमिपूजन नितिन गडकरी ने किया था। इसके अलावा एक पानी की टंकी के अलावा कोई अन्य पानी की टंकी शुरू नहीं हो पाई। इसके लिए व्यॉपकॉस समूह को ठेका दिया गया है। कंपनी को केंद्र ने उक्त कंपनी की नियुक्ति की थी.
इस वजह से कोई भी कंपनी के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पाया,चाहे मनपा प्रशासन हो या फिर जनप्रतिनिधि। दूसरी ओर मनपा ने उक्त टंकिया के निर्माण के लिए उन्हें समय पर जगह नहीं दी। इसलिए 170 करोड़ रुपये का यह प्रकल्प अब 250 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.
याद रहे कि गडकरी और फडणवीस के कार्यकाल में शहर का तेजी से विकास हुआ। कई परियोजनाएं चल रही हैं। गडकरी के सक्रियता से कई प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो गए हैं. तकनीकी दिक्कतों को चुटकी में सुलझा लिया जा रहा है। मेट्रो रेल की स्टेशनों के लिए पहले जगह उपलब्ध कराया गया और फिर इसकी उपयोगिता में बदलाव किया गया। इसके लिए कई संस्थानों की जगह ली गई। उनमें से किसी की भी मना करने की हिम्मत नहीं हुई।
इसके बावजूद सबकी प्यास बुझाने वाली अमृत परियोजना का अटकना,सभी के लिए आश्चर्य का विषय बन गया हैं. गडकरी किसी प्रोजेक्ट की घोषणा करने के बाद लगातार उसका FOLLOW-UP लेने से उसको शुरू और साथ में ख़त्म करने में देरी नहीं होती। तकनीकी समस्याओं का समाधान सीधे CALL कर हल करते रहे हैं। चर्चा यह भी हो रही कि फडणवीस-गडकरी की अमृत परियोजना में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई।
जानकर सूत्रों का कहना है कि उक्त ठेकेदार कंपनी का मुख्यालय दिल्ली में है। सिर्फ नागपुर में एक ऑफिस खोला गया है लेकिन इस कार्यालय से कोई जानकारी नहीं दी जाती है। यहां के स्टाफ का कहना है कि हमें बोलने का कोई अधिकार नहीं है. इसलिए इस योजना की अच्छाई को समझने का कोई तरीका नहीं है।