Published On : Thu, Feb 8th, 2018

परिवहन विभाग : जांच की निष्पक्षता पर संदेह

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नागपुर: गत शनिवार को मनपा की आमसभा में परिवहन विभाग के असंवैधानिक करतूतों को पक्ष-विपक्ष ने उठाया जरूर लेकिन ढंग से मुद्दा नहीं उछालने और इस दौरान सत्तापक्ष के समर्थकों का बीच में कूदनने से विभाग के दोषी अधिकारियों के लिए रामबाण साबित हुआ. इस मौके का फायदा उठाकर सत्तापक्ष नेता ने मामले की गंभीरता को देख कार्रवाई की सिफारिश की बजाय अतिरिक्त आयुक्त स्तर से जांच की सिफारिश की.

इस घटनाक्रम के पहले संबंधित मामले के मुख्य दोषी ने अपने आका के प्रभाव का इस्तेमाल कर कार्रवाई करने के सक्षम अधिकारियों पर दबाव बना चुके थे. इस हिसाब से दोषी ने पूरी तैयारी कर ली थी.

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अब आमसभा में जांच की घोषणा के बाद यह तर्क-वितर्क लगना शुरू हो गया था कि जांच अधिकारी कौन होगा. अगर रवींद्र कुंभारे हुआ तो निष्पक्ष वर्ना जांच की निष्पक्षता पर शत-प्रतिशत संदेह प्रकट किया गया. कल बुधवार की शाम जांच अधिकारी के कक्ष के बाहर खड़े सूत्रों से यह जानकारी मिली कि दोषी को पूरी तरह बचा लिया गया है.

पिछले सप्ताह जांच अधिकारी ने दोषी अधिकारी को फटकार लगाई थी कि डिम्ट्स को किया गया भुगतान उनके जानकारी के बगैर क्यों किया गया. जबकि अब तक हुए सभी भुगतान के पहले उन्हें जानकारी दी जाती थी. इस सवाल पर जगताप ने उक्त अतिरिक्त आयुक्त को जानकारी दी कि डिम्ट्स को भुगतान मनपायुक्त के आदेश पर किया गया. इसी बैठक में वित्त व लेखा विभाग ने डिम्ट्स को किए गए भुगतान में कुछ खामियां निकाली थी. इन खामियों को पुष्टि करने हेतु वित्त विभाग को मनपा परिवहन विभाग के योजनाकार ‘डीआरए’ से सलाह मशवरा करने के निर्देश दिए थे.

इसके बाद यह भी जानकारी मिली थी कि डिम्ट्स को भुगतान न करने के लिए एक पदाधिकारी ने मना किया था बावजूद इसके व्यवस्थापक ने उन्हें नज़रअंदाज कर करोड़ों का भुगतान करवाया.

आमसभा के एक दिन पूर्व सत्तापक्ष की पार्टी बैठक में उक्त दोषी अधिकारी से सम्बंधित सवाल उठे थे, जिसे यह कह कर टाल दिया गया कि डेप्युटेशन पर लाए कर्मी को सीधे पदमुक्त नहीं किया जा सकता है. परिवहन समिति का सभापति भी सत्तापक्ष का ही है. इनके ४ दर्जन निर्देश रूपी पत्रों को नियमित दरकिनार करने वाले अधिकारी को बचाने का अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि ‘दाल में जरूर कुछ काला है’ या फिर व्यवस्था ही काली हो चुकी है.

इसका नमूना मंगलवार व बुधवार को देखने को मिला. विपक्ष नेता ने परिवहन व्यवस्थापक से मंगलवार की दोपहर डिम्ट्स की फाइनल ‘आरएफपी’ और डिम्ट्स के सारे ‘बिल क्लेम’ की कॉपी मांगी. मंगलवार शाम को देने की हामी भरी, शाम को नहीं मिलने पर कॉल किया तो बुधवार की सुबह १० बजे देने का वादा किया गया. बुधवार को भी तीन बार कॉल करने के बाद शाम को डिम्ट्स की ‘आरएफपी’ की प्रत तो दे दी गई लेकिन डिम्ट्स का ‘बिल क्लेम’ की कॉपी नहीं दी गई. कल शाम जब विपक्ष नेता ने अपनी मांग दोहराई तो परिवहन विभाग के सभी ‘स्टेक होल्डर्स’ को किए गए भुगतान की प्रत थमा दी गई. याने मांगा कुछ जा रहा, व्यवस्थापक थमा कुछ और रहा. ऐसा भी नियमित परिवहन सभापति के साथ व्यवहार किया जाना, जिसे प्रशासन व सत्तापक्ष की शह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.


गड़बड़ी की संभावना

डिम्ट्स को पूर्ण प्रकल्प के लिए करार के अनुसार मासिक भुगतान तय हुआ था. आज की सूरत में प्रकल्प अधूरा है. ४८७ बस की बजाय ३६० बस ही चल रही हैं.बावजूद इसके पूर्ण प्रकल्प के लिए तय मासिक भुगतान जारी है. इसके अलावा करार के अनुसार ११ मुद्दों में से आधे से अधिक पूर्णतः पूरे नहीं किए. करार में दर्शाये गए तकनिकी-गैर तकनिकी कर्मियों की नियुक्ति/भर्ती नहीं की. सार्वजानिक तौर पर सिर्फ ‘डब्लूटी’ पकड़ने और लाल बस ऑपरेटरों पर आर्थिक नुकसान लगाने में मदमस्त दिख रहे हैं. क्या सिर्फ इसके लिए मनपा परिवहन विभाग डिम्ट्स को करोड़ के आसपास मासिक भुगतान करना समझ से परे है.

करोड़ों की ईटीएम मशीन पदाधिकारियों को नज़रअंदाज कर खरीदने और लाखों के कैशकार्ड घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगाया गया. अब तक हुए ३ दफे हड़ताल से शहर के आम यात्रियों को हुए नुकसान का जिम्मेदार भी ठहराया गया है.

उल्लेखनीय यह है कि क्या डिम्ट्स को किए जा रहे भुगतानों के कई लाभार्थी मनपा में है. जिनमें खाकी और खादी दोनों के होने की चर्चा मनपा में गर्माई हुई है. उक्त मामले की जांच प्रकल्प के योजनाकार ‘डीआरए’ के मार्फ़त होनी चाहिए.

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