Published On : Tue, Jan 22nd, 2019

एचसीजी एनसीएचआरआइ ने नागपुर में पहली बोन मैरो ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया

Advertisement

मध्य भारत में बीएमटी जैसी उन्नरत प्रक्रिया की पेशकश की और क्षेत्र में रक्तw संबंधित रोगों के लिये देखभाल को सुलभ बनाया

नागपुर: हेल्थ केयर ग्लोलबल-नागपुर कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च इंस्टीदट्यूट (एचसीजी-एनसीएचआरआइ) ने एग्रेसिव मल्टी0पल मेलोमा से ग्रस्त अपने पहले मरीज का बोन मैरो ट्रांसप्लां ट प्रक्रिया के माध्यचम से उपचार किया। 63 वर्षीय इस मरीज की बीमारी का पता जून 2018 में चला था। विशेषज्ञों की टीम द्वारा एक स्टे म सेल ट्रांसप्लांटट की प्रक्रिया करने का फैसला करने से पहले उन पर कीमोथैरेपी की कई साइकिल की गई। ट्रांसप्लांसट के बाद मरीज की सेहत में सुधार हुआ और अब वह अच्छाल है।

Gold Rate
04 April 2025
Gold 24 KT 90,500/-
Gold 22 KT 84,200 /-
Silver / Kg - 93,500 /-
Platinum 44,000 /-
Recommended rate for Nagpur sarafa Making charges minimum 13% and above

एचसीजी एनसीएचआरआई का 9-बेडेड बोन मैरो ट्रांसप्लांट प्रोग्राम मध्य भारत में सबसे बड़ा है। इसमें एचईपीए फिल्टर्स और पॉजिटिव प्रेशर वेन्टिलैशन है, ताकि वातावरण में सूक्ष्मजीव न हों, जिससे संक्रमणों में कमी आती है, जो रोग और मौत होने के प्रमुख कारण हैं।

डॉ. निषाद धकाते, कंसल्टेन्ट- हीमैटोलॉजिस्ट एवं बीएमटी फिजिशियन, एचसीजी एनसीएचआरआई ने कहा, ‘‘स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है और संक्रमणों को दूर रखना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि छोटा संक्रमण भी रोगी को जोखिम में डाल सकता है। हीमैटोपोईटिक स्टेम सेल्स खुद को नया कर सकती हैं, और व्यक्ति के संपूर्ण रक्त एवं प्रतिरोधक तंत्र का निर्माण कर सकती हैं। पहले तो स्टेम सेल्स को पेरिफेरल ब्लड से संग्रहित किया जाता है, आजकल सबक्युटैनीयस इंजेक्शंस दिये जाते हैं, ताकि स्टेम सेल्स बोन मैरो से रक्त में आएं। फिर, स्टेम सेल्स के ट्रांसफ्युजन से पहले रोगी को कीमोथेरैपी का भारी डोज दिया जाता है। यह स्टेम सेल्स इंट्रावेनसली दी जाती हैं, जिसे स्टेम सेल इंफ्यूजन कहा जाता है। इसमें सर्जरी की जरूरत नहीं होती है। स्टेम सेल ब्लडस्ट्रीम में परिवहन करती हैं और बोन मैरो में रूक जाती हैं। यहाँ वह सामान्य रक्त कोशिकाएं बनाती हैं। इस प्रक्रिया में लगभग 2 से 4 सप्ताह लगते हैं।

माइलोमा (रक्त कैंसर का एक प्रकार) के पहले मामले में एचसीजी एनसीएचआरआई में ट्रांसप्लांट हुआ, रोगी को डिस्चार्ज कर दिया गया और वह ठीक है। दूसरा बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक 15 वर्षीय लड़के का किया गया, जिसे लिम्फोमा (रक्त कैंसर का एक प्रकार) था, वह अभी अवलोकन में है।’’

डॉ. वैभव चौधरी, कंसल्टेन्ट- मेडिकल ऑन्कोलॉजी, एचसीजी एनसीएचआरआई ने कहा, ‘‘कीमोथेरैपी भारी डोज में दिया जाता है, ताकि रोग या कैंसर दूर हो सके। एलोजेनीक (डोनर) बीएमटी के मामले में कीमोथेरैपी प्रतिरोधक तंत्र को दबाती है, ताकि ट्रांसप्लांटेड बोन मैरो आ सके। इस दौरान रोगी को कम प्रतिरोधकता के कारण संक्रमण हो सकते हैं। इस दौरान रोगी को भी रक्त उत्पादों की आवश्यकता होती है, जो हमारे सेंटर में सफलता से हो जाता है।’’

रोगी (जो अपनी व्यक्तिगत जानकारी प्रकट नहीं करना चाहता है) ने कहा, ‘‘रक्त कैंसर के इस प्रकार का रोगी पाये जाने के बाद मैं यात्रा करने, अपने परिवार और घर को छोड़कर अपने गृहनगर से उपचार के लिये दूर नहीं जाना चाहता था। हम उपचार का स्थान तलाश रहे थे, तब मेरे परिवार ने अखबार में एचसीजी एनसीएचआरआई के बारे में पढ़ा और हमने वहाँ के डॉक्टर्स को दिखाने का निर्णय लिया। उपयुक्त परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने बीएमटी प्रोसीजर की सलाह दी। अपनी बीमारी के कारण मैं लगातार अपने डॉक्टरों के संपर्क में हूँ और नागपुर, यानि अपने गृहनगर में अपने परिजनों के बीच मेरा स्वास्थ्य सुधर रहा है।’’

बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है, जो ल्युकेमिया, लिम्फोमा और बोन मैरो फैल्योर जैसे रोगों के उपचार में रोकथाम की भूमिका निभाती है। इसके लिये डॉक्टरों और नर्सों की अत्यंत कुशल टीम के साथ सुसंस्कृत अवसंरचना और उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी चाहिये। रक्त सम्बंधी इन रोगों के उपचार हेतु स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की आवश्यकता वाले रोगियों की संख्या लगभग 1000 प्रतिवर्ष होती है, लेकिन इन क्षेत्रों में पर्याप्त उपचार सुविधाओं के अभाव के कारण केवल 1 प्रतिशत रोगियों का ही स्टेम सेल ट्रांसप्लांट हो पाता है। एचसीजी एनसीएचआरआई की बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट में उन शिशु और वयस्क रोगियों को अच्छी मेडिकल देखभाल प्रदान करने के लिये एक समर्पित कार्यक्रम है, जो ट्रांसप्लांटेशन थेरैपी से ठीक हो सकते हैं।

Advertisement
Advertisement