Published On : Mon, Mar 4th, 2019

हाइड्रो फ्यूल के ज़माने में क्या सीएनजी, इलेक्ट्रिक टिक पाएंगी !

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अग्रिम प्रोद्योगिक(एडवांस टेक्नोलॉजी ) मामले में दशक पीछे हैं नागपुर समेत समूचा विदर्भ

नागपुर: प्रचलित ईंधन डीजल, पेट्रोल के बढ़ते मूल्य से लोग परेशान हैं. यही वजह है कि इनके पर्याय ऊर्जा के श्रोतों की खोज चल रही है. इस मामले में देश तो पिछड़ा हैं ही उससे भी एक दशक से अधिक पिछड़ा नागपुर और विदर्भ होने का अहसास हो रहा है.

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पिछले सप्ताह मनपा की एक डीजल बस को सीएनजी में परिवर्तित कर शहर बस सेवा में शामिल किया गया. यह भी दावा किया गया कि यह बस रविवार से तय किए गए मार्ग पर दौड़ती नज़र आएंगी. इसके अगले चरण में सर्वप्रथम मनपा आपली बस के पुणे के बस ऑपरेटर ट्रैवेल टाइम की ५० बसों को सीएनजी में परिवर्तित करेगी. जिसकी समय-सीमा का न तो निर्धारण किया गया और न ही गंभीरता से लिया गया.

सूत्र बतलाते हैं कि डीजल बस को सीएनजी में परिवर्तित करने के लिए आरटीओ से कई प्रकार की अनुमतियां लेने के बाद सीएनजी में परिवर्तित करने की प्रक्रिया शुरू होती है. अर्थात एक बस को सीएनजी में परिवर्तित करने के लिए कम से कम एक माह लगना तय है. फिर ५० बसों को सीएनजी में तब्दील करने में कितना समय लगेगा. क्या डीजल बस को सीएनजी में तब्दील करने का जिम्मा पुणे की रॉमेट कंपनी को दिया गया, वह इस चुनौती को स्वीकारने के लिए सक्षम हैं ?

मनपा के ३३७ स्टैण्डर्ड/मिडी बसें हैं.इसके अलावा १२५ से अधिक अन्य छोटे-बड़े वाहन हैं. गडकरी के समक्ष बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई कि सभी आपली बस के अलावा मनपा के सभी वाहनों को सीएनजी में जल्द तब्दील कर दी जाएंगी, जो कि असंभव है, क्यूंकि रॉमेट से किए गए करार में सर्वप्रथम आपली बस के तीनों ऑपरेटरों के क्रम अनुसार ५०-५० बसों को सीएनजी में तब्दील किया जाएगा,जो कि इस वर्ष असंभव नज़र आ रहा है. इसके साथ या इसके बाद मनपा के वाहनों खासकर अधिकारियों और पदाधिकारियों के वाहनों को सीएनजी में तब्दील करने की कोशिश की तो शहर बसों को सीएनजी में तब्दील करने की संख्या घट सकती है या फिर रॉमेट को मनुष्य बल बढ़ाने होंगे.

इलेक्ट्रिक बस नई गुलामी का मार्ग करेगा प्रसस्त
इलेक्ट्रिक बस अर्थात बैटरी से चलने वाली बस. बैटरी का निर्माण कोबॉल्ट से होता है. कोबॉल्ट की खदानें इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका में अत्यधिक हैं. खासकर इंडोनेशिया के नागरिक भारत को बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, अगर भारत सरकार ने सीएसआर के तहत इंडोनेशिया में योगदान दिया तो भारत को कोबॉल्ट उत्खनन आदि की अनुमति सह भारत में लाकर बैटरी निर्माण का मार्ग प्रसस्त हो सकता है. इससे भारत में सस्ता बैटरी का निर्माण होगा और देश में इलेक्ट्रिक बसों का संचलन सुलभ और सस्ता हो सकता है. जहां तक गुलामी का तर्क है, यह इसलिए कहीं जा रही क्यूंकि इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका में कोबॉल्ट प्राप्ति के लिए चीन ने काफी सीएसआर खर्च कर कोबॉल्ट प्राप्त कर चीन ले जा रहा है. फिर चीन में कोबॉल्ट से बैटरी का निर्माण कर भारत को बेच रहा है. आज किसी ने इलेक्ट्रिक बस की खरीदी की तो उसकी ‘डिलेवरी’ कम से कम ६ माह लगना तय है. जब देश में इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ते जाएंगी तो उसे बैटरी आपूर्ति करने में चीन अपनी मनमानी कर सकता है. ऐसे मामले में चीन पर देश आश्रित हो जाएंगा.

हाइड्रो फ्यूल का शुरू हो चुका उपयोग
विदेश की चुनिंदा धरती पर हाइड्रोजन फ्यूल का इजाद किया गया और उसका सफल उपयोग कर वाहनों का संचलन शुरू हो चुका है. इस मामले के अभ्यासक डेनिस अब्राहम ने बताया कि हाइड्रोजन फ्यूल का निर्माण गंदे पानी से होता है. गंदे पानी से हाइड्रोजन अलग कर लिया जाता है. फिर इस पर प्रक्रिया कर ईंधन तैयार किया जाता है. तैयार ईंधन से वाहनों को चलाया जा रहा है. चलते वाहन से धुंए की जगह पानी की छींटे बाहर निकलती है जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं है. धीरे-धीरे इस ईंधन का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है और भारतीय वाहन निर्माताओं में इस ईंधन को अपनाने में देरी की जा रही है. जबकि विदेश वाहन निर्माता इस मामले में काफी आगे चल रहे हैं.

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