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नागपुर : मातृत्व की कल्पना सिर्फ स्त्री या पुरुष तक मर्यादित नहीं है इस कल्पना का मकसद सभी में मातृ भाव को जगाना है। उक्त विचार लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने रेशमबाग मैदान में आयोजित धर्मसंस्कृति महाकुंभ के अंतर्गत मातृसंसद कार्यक्रम में व्यक्त किया। महाजन कार्यक्रम में बतौर प्रमुख अतिथि उपस्थित हुई और कार्यक्रम को संबोधित भी किया। उन्होंने कहाँ मातृत्व शब्द की कल्पना करते समय पोषण , संरक्षण , संवर्धन और संस्कार का भाव निकालते है।
इन सभी बातो का भावार्थ मातृभूमि शब्द में समाविष्ठ है। भूमाता को मातृभूमि कहने का संस्कार भारत के संस्कार की वजह से है इसलिए यह कल्पना सर्वव्यापी है। महिलाये हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति रखती है। किसान ,मजदुर का जब हम उल्लेख करते है उसमे स्त्री को अलग नहीं रख सकते। एक गृहणी घर चलाते हुए भी सारथी की भूमिका सक्षम ढंग से निभाती है।
इसी कार्यक्रम में अपने बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहाँ भारतीय संस्कृति में स्त्री के सौंदर्य से ज्यादा मातृत्व ज्यादा अहम मानी जाती है। मातृत्व का सम्मान सर्वोच्च माना जाता है। महिलाओ को समाज के राष्ट्र के कल्याण की जवाबदारी संभालनी चाहिए। स्त्री के वात्सल्य की वजह से उसे बहुआयामी कार्य करने का सामर्थ मिलता है।