Published On : Thu, Aug 16th, 2018

जब नागपुर के कार्यकर्ताओं को वाजपेयी ने यूपी की राजनीति में अज़गर का मतलब समझाया

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नागपुर: भारतीय जनता पार्टी के आज के दौर के किसी भी नेता और कार्यकर्त्ता के लिया पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पितातुल्य कहे जा सकते है। ख़ुद वाजपेयी भी देश भर के पार्टी के लाखों-लाख कार्यकर्ताओं के लिए पालक की भूमिका ही निभाते थे। ये वाजपेयी की शख्शियत ही है की जीवन में जिसका भी उनसे एक बार भी संवाद हुआ। उनकी स्मृतियाँ उसके साथ रही। नागपुर से तो वाजपेयी का गहरा नाता था ही वो जब भी नागपुर आते छोटे-मोटे ही कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं से संवाद जरूर करते। वाजपेयी के स्वाभाव के चलते ऐसे कार्यक्रमों में युवा कार्यकर्त्ता भी उनसे ख़ूब सवाल पूछते। पार्टी की दूसरी पीढ़ी के लगभग हर बीजेपी नेता की वाजपेयी से जुडी यादें है।

नगरसेवक दयाशंकर तिवारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को याद करते हुए बताते है की ये वो नेता थे जिन्होंने देश में स्वस्थ राजनीति की शुरुवात की। वो किसी राजनीतिक कार्यकर्त्ता द्वारा की जाने वाली राजनीतिक हिंसा के ख़िलाफ़ भी थे। ऐसे कई मौके आये जब तिवारी को वाजपेयी से संवाद करने का मौका मिला। तिवारी ने बताया की एक बार वाजपेयी नागपुर आये तो न्यू इंग्लिश स्कूल के प्रांगण में उन्होंने शहर के प्रमुख कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। मंच खुला था और सामने वाजपेयी थे तो कार्यकर्ताओं ने जमकर सवाल किये। पहला सवाल जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बच्छराज व्यास के पुत्र नंदू व्यास ने किया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति से अजगर कब समाप्त होगा। सवाल सुनकर सब हतप्रभ हुए लेकिन वाजपेयी कार्यकर्त्ता के सवाल को अच्छी तरह पकड़ लिए। सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहाँ की यूपी की राजनीति अहिर,जाट,गुर्जर और राजपूत के इर्दगिर्द केंद्रित है। तब जाकर वहाँ मौजूद अन्य कार्यकर्ताओं को अजगर का मतलब समझ आया।

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इसी मीटिंग में मौजूदा विधानसभा सदस्य अनिल सोले ने महाराष्ट्र में उस समय हिंदूवादी संगठनो द्वारा “रिडल्ट्स इन हिन्दुइज़म” नामक पुस्तक को लेकर हिंसक प्रदर्शन पर सवाल किया। कई जगह तत्कालीन शिक्षा मंत्री राम मेघे का पुतला भी फूंका गया था। इस सवाल का जवाब देते हुए वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में राजनीतिक कार्यकर्त्ता के हिंसक बर्ताव कर सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को गलत बताया। वाजपेयी ने सोले को जवाब दिया किसी पुस्तक में लेखक ने अपनी भावना व्यक्त की है। ये उसके विचार है अगर आप को उससे आपत्ति है तो आप विरोध में दूसरी पुस्तक लिखें नाकि हिंसा करे। वाजपेयी का ये जवाब बताता है की वो किस खुलेपन की ईमानदार राजनीति के लिए अपने पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर रहे है।

दयाशंकर तिवारी को 1987 में देश का सर्वश्रेष्ठ वक्त का पुरुस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से प्राप्त हुआ था। भारत की विदेश नीति के अंतर्गत बीते 40 वर्षों में भारत की विदेश नीति का विश्व शांति में सहयोग विषय पर दिए भाषण में पुरुस्कृत होने के बाद 10 दिसंबर 1987 को वाजपेयी ने तिवारी का सत्कार किया था। इस कार्यक्रम में पहले वाजपेयी ने तिवारी से भाषण का विषय पूछा और आप ने क्या बोलै था ये पूछा। इस पर तिवारी ने जवाब दिया आप ने जो यूएनओ में भाषण दिया था वही मैंने अपने भाषण में बोला था यह जवाब दिया। इस पर वाजपेयी ने दूसरा सवाल दागा मैंने क्या भाषण दिया था। इस पर तिवारी ने जवाब दिया वही जो मैंने दिल्ली में अपने भाषण में कहाँ था। तिवारी के हाज़िरजवाबी के ज़वाब को सुनकर वाजपेयी कार्यक्रम में ठहाके लगाकर हंसने लगे। बाद में उन्होंने तिवारी को विशेष समय देकर बातचीत की जिसमे उन्होंने पूछा उनके भाषण की हिंदी कॉपी उन्हें कहाँ से मिली। तिवारी ने जवाब दिया वो खुद उसके लिए दिल्ली स्थित पार्टी कार्यालय गए थे। वह से पांचजन्य के अंक से उन्हें वो भाषण मिला था। एक कार्यकर्त्ता द्वारा भाषण के लिए मेहनत को देखकर वाजपेयी काफ़ी प्रभावित हुए थे।

तिवारी ने एक और किस्सा सुनाया तत्कालीन उम्मीदवार रमेश मंत्री के चुनाव में वाजपेयी प्रचार के लिए कस्तूरचंद पार्क मैदान में आने वाले थे। विमान पहुँचने में समय था तो दयाशंकर तिवारी खुद भाषण दे रहे थे। इतने में वाजपेयी आ जाते है। वो अपना भाषण समाप्त कर देते है। मंच पर पहुँचते ही उन्होंने सवाल किया अभी भाषण कौन दे रहा था। तभी एक कार्यकर्त्ता मनोहरराव शेंडे ने उन्हें बताया अपना पंडित उन्होंने कहाँ उसे बुलाओ। तिवारी के पहुँचते ही वाजपेयी ने सबसे पहले नाम पूछा फिर भाषण की तारीफ़ करते हुए बोले ऐसा लग रहा था मै ही भाषण दे रहा था।

वाजपेयी खुद अपनी भाषण शैली के लिए प्रसिद्ध थे और वो उन कार्यकर्ताओं को अधिक चाहते थे जिनकी भाषण शैली आकर्षक हो। ऐसा ही एक किस्सा जनसंघ के दौर का है। राजाभाऊ पोफली जनसंघ के ज़माने के कार्यकर्त्ता है और वाजपेयी के साथ काम भी कर चुके है। एक बार वाजपेयी की सभा कस्तूरचंद पार्क मैदान में थी। उन्हें आने में देरी थी तो नीलदावर नामक जनसंघ के कार्यकर्त्ता जो वाजपेयी के लहजे और आवाज में भाषण देते थे। उनके पुराने भाषण को बोल रहे थे। तभी वाजपेयी का आगमन होता है। वाजपेयी न केवल भाषण की प्रशंसा करते है बल्कि उसी पुराने भाषण से ही अपने भाषण की शुरुवात करते थे।

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